नालंदा विश्वविद्यालय
को क्यों जलाया गया था..? जानिए
सच्चाई ...??
एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क
मियां लूटेरा था ....बख्तियार खिलजी. इसने
११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित
कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने
उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.
किसी ने उसको सलाह दी...
नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के
प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र
जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय
विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय
वैद्य ...
उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और
वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए
फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए
उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी...
मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...
वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत
उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर
चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से
इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट
हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके
मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय
वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने
के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग
लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के
राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग
लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके
जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार
डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक
बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन
बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह
कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर
रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज
को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!
बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ
पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप
लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट
गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान
का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया
आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान
लेते है
यह प्राचीन भारत में उच्च्
शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और
विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के
इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के
साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के
छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में
पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व
और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में
एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम
द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध
विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन
वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक
पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण
के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग
तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस
विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत
जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में
यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक
विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत
किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र'
का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय
गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७०
को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार
गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग
मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले
सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में
अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट
हर्षवर्द्धन और पाल
शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए
शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के
साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से
भी अनुदान मिला।
स्वरूप
यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय
विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें
विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं
अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस
विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न
क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान,
चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस
तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण
करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट
शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध
धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय
की नौवीं शती से बारहवीं शती तक
अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
परिसर
अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र
में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य
कला का अद्भुत नमूना था।
इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से
घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य
द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर
मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक
भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध
भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं।
केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और
इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें
व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में
तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के
होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल
के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर
की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक
इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे।
प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था।
आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक
प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के
अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें
भी थी।
प्रबंधन
समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध
कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे
जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे।
कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के
परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम
समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य
देखती थी और द्वितीय समिति सारे
विश्वविद्यालय की आर्थिक
व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल
करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले
दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय
की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से
सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े
तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य
इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के
आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम,
द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे।
नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र,
धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और
स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग
के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख
शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक
और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से
ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ
एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस
विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे
जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है
वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।
ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ
आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र
३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ
का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम
प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और
उसके कारण
प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते
थे। उन्हें तीन कठिन
परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था।
यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध
आचरण और संघ के नियमों का पालन
करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति
इस विश्वविद्यालय में आचार्य
छात्रों को मौखिक व्याख्यान
द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त
पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी।
शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर
में अध्ययन तथा शंका समाधान
चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र
यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन,
वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं
का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत
और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण,
दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र
तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के
अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक
काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ
विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु
की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान
का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र
अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय
नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और
आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक
विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से
अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस
पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें
थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर'
नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था।
'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य
हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से
अनेक
पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने
साथ ले गये थे।
को क्यों जलाया गया था..? जानिए
सच्चाई ...??
एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क
मियां लूटेरा था ....बख्तियार खिलजी. इसने
११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित
कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने
उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.
किसी ने उसको सलाह दी...
नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के
प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र
जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय
विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय
वैद्य ...
उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और
वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए
फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए
उनको बुलाना पड़ा
उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी...
मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...
वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत
उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर
चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से
इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट
हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके
मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय
वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने
के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग
लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के
राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग
लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके
जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार
डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक
बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन
बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह
कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर
रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज
को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!
बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ
पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप
लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट
गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान
का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया
आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान
लेते है
यह प्राचीन भारत में उच्च्
शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और
विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के
इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के
साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के
छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में
पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व
और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में
एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम
द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध
विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन
वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक
पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण
के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग
तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस
विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत
जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में
यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक
विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत
किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र'
का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय
गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७०
को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार
गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग
मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले
सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में
अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट
हर्षवर्द्धन और पाल
शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए
शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के
साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से
भी अनुदान मिला।
स्वरूप
यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय
विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें
विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं
अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस
विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न
क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान,
चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस
तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण
करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट
शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध
धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय
की नौवीं शती से बारहवीं शती तक
अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
परिसर
अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र
में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य
कला का अद्भुत नमूना था।
इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से
घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य
द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर
मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक
भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध
भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं।
केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और
इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें
व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में
तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के
होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल
के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर
की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक
इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे।
प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था।
आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक
प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के
अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें
भी थी।
प्रबंधन
समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध
कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे
जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे।
कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के
परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम
समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य
देखती थी और द्वितीय समिति सारे
विश्वविद्यालय की आर्थिक
व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल
करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले
दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय
की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से
सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े
तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य
इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के
आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम,
द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे।
नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र,
धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और
स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग
के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख
शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक
और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से
ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ
एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस
विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे
जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है
वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।
ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ
आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र
३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ
का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम
प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और
उसके कारण
प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते
थे। उन्हें तीन कठिन
परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था।
यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध
आचरण और संघ के नियमों का पालन
करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति
इस विश्वविद्यालय में आचार्य
छात्रों को मौखिक व्याख्यान
द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त
पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी।
शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर
में अध्ययन तथा शंका समाधान
चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र
यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन,
वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं
का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत
और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण,
दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र
तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के
अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक
काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ
विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु
की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान
का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र
अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय
नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और
आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक
विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से
अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस
पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें
थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर'
नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था।
'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य
हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से
अनेक
पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने
साथ ले गये थे।
![संस्कृत के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य -----
1. कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा। संदर्भ: - फोर्ब्स पत्रिका 1987.
2. सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है) संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी.
3. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति... स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद).
4. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी (Technology) रखती है।संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी.
नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं. असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं.
दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।
5. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है। संदर्भ: - यूएनओ
6. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके। परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।
7. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है। संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985.
8. संस्कृत भाषा वर्तमान में "उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी" तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज "सरल किर्लियन फोटोग्राफी" भी नहीं है )
9. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया वर्तमान में भरत नाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। (नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है ).
10. ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है.
जयतु संस्कृतं ! जयतु भारतं
चाणक्य का अखंड भारत .
बैदिक समाधान गूरूकुल
अजय कर्मयोगी
बैदिक समाधान ट़ृष्ट 9336919081॥वन्दे मातरम्
@[148768761939483:274:आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति]
@[148768761939483:274:आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति]](http://sphotos-g.ak.fbcdn.net/hphotos-ak-ash3/s480x480/555086_163999803749712_1321815784_n.jpg)


