Friday, 29 March 2013

ब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं

डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है। यह बस एक नमाज पढने की जगह है और आप नमाज कही भी पढ़ सकते है। एक बार सऊदी अरब के राजा को अपना महल बनाना था और उसके लिए उसे जगह चाहिए थी तो उसने कहा की बिलाल मस्जिद को तोड़ डालो महल बनाने के लिए। इसपे लोगों ने कहा की इस मस्जिद में पैगम्बर मुहम्मद नमाज पढ़ते थे , इसे तो कम से कम मत तोड़ो, क्योंकि सऊदी अरब में कई बार सड़क बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है। तब वहां के राजा ने कहा की खबरदार! ऐसी बात करने से तुम्हारे दिमाग में मूर्ति पूजा का विचार आ रहा है। इस्लाम में हम मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं। क्या फर्क पड़ता है की पैगम्बर मुहम्मद ने यहाँ पर नमाज पढ़ा? यह एक मस्जिद है और इसे हम दूसरी जगह बनायेंगे।

मै यही कहता हूँ सभी मुसलमान भाइयों से की श्री राम की जगह (अयोध्या) में, श्री कृष्ण की जगह (मथुरा) में और भगवान् शिव की जगह काशी विश्वनाथ में जहां इन भगवानो के मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये गए थे, वहां के बजाये हम आपको दूसरी जगह मस्जिद बना कर देंगे। लेकिन जहा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है उन्हें आप छोड़ दो। मुस्लिम छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं की अगर हिन्दू मुस्लिम के बीच में भाईचारा की भावना आ जाएगी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो ऐसा होने नहीं देते। हम मुस्लिम, इसाई और बाकि धर्मो के लोगो को एक साथ तब जोड़ सकते हैं जब हम स्पष्ट बात करें। जो हम कहें वो करें, बस उनके वोट लेने के लिए नहीं।

http://www.youtube.com/watch?v=85YxApDtCco

Tuesday, 26 March 2013

आधारकार्ड या घोडे की लगाम ?


आधारकार्ड या घोडे की लगाम ?

अगर आप कोई बडी होटल या कोइ बडे मोल में या बडी होस्पिटल में गये, भले पेहली बार गये, और वहां के रिसेप्शन पर आप को कोइ मिठी आवाज में आपका नाम ले कर आपका स्वागत करे तो कैसा लगेगा ? आप खूश हो जायेंगे, आपको लगने लगेगा सारी दुनिया मुझे पहचानती है, आप का अहम संतुष्ट होगा, आप चने के पेड पर चड जाएन्गे । ये लेख आपको चने के पेड से उतारने के लिए लिखा है ।
पहले चौथी दुनियावाले मनिषभाई की बात पढ लिजीए । इस लेख की शुरुआत ही उनकी बातों से है, जो बातें उनसे छुट गई है वो मैंने आगे बढाई है ।

यह कार्ड ख़तरनाक है : पार्ट-3, आधार कार्ड आधारहीन है

बिना कोइ आप की हैसियत कौन आपको पहचानेगा ? लेकिन आपको पहचाना जायेगा वो भी हकिकत है । आप के शरीरमें एक छोटासा केप्शुल लगा दिया जाएगा जो “RFID CHIP” (Radio-frequency identification ) के नामसे जाना जाता है । ये मानव के लिए एक लगाम है, जैसे घोडे के मुह में लगी लगाम, बैल के नाक में लगी नकेल, इतर प्राणी के कान में लगे डिवाईस । आप जहां भी जाओगे सेटेलाईट द्वार आप सिस्टम के साथ जुडे रहोगे । आप गूगल करना जानते हैं । आप कीसी भी बेंक, होस्पिटल, मोल में जाओगे तो वहां जाते ही वहां के कोंप्युटरमें आप खूद गूगल हो जाओगे । आप का सारा बायोडेटा उन कोम्प्युटरों में आ जायेगा । आप को पहचानने का यही तरिका है ।
rfid.verichip-details
“RFID CHIP” आपका “आधारकार्ड” है । इस के साथ बायोडाटा के अलावा आपकी पूरी प्रोपर्टी, आप के बेंक अकाउन्ट, आप की विमा कंपनी, जहां नौकरी करते हैं वो ओफिस, ये सब जोड दिया जायेगा । “न्यु वर्ल्ड ओर्डर” वाले केशलेस सोसाईटी बनाने जा रहे हैं, तो आप खूद अपना एटीएम बन जाओगे, चलन या नोट की जरूरत ही नही और वो होन्गे भी नही । कोइ भी सेवा या सामान की खरीदारी करो रकम दुकानदार आपके बेंक खाते से अपने बैंक खाते में ले लेगा । आप की पगार आप के बैंक खाते में आयेगी, आप को अपने बच्चों की जेब खर्ची उनके बैंक खातों में डालनी होगी । घर चलाने के लिए पत्नि को भी एटीएम बनाना पडेगा उस के खातेमें रकम डाल के ।
एक तरिके से आदमी सिस्टम का गुलाम हो जायेगा । अगर आदमी सरकार के विरोध में जंतरमंतर चला जाता है तो जीतने भी लोग वहां गये सब को घर वापस आना हो सब को पैदल ही आना पडेगा । सब के बेंक खाते डिजेबल कर दिये जायेन्गे । ना वो बस का टिकट ले पायेगा ना टेक्सी ना रिक्षा ।
आप की इमेल आईडी से, आप सोसियल साईट में क्या क्या गुल खिला रहे हो उस की स्टडी कर के आप की विचार धारा, आप के ईरादे समज लिये जायेंगे और आप के साथ कैसा सलुक करना है वो डेटा भी ईस आधार कार्ड में जोड दिया जायेगा ।
एक उदाहरण । अगर आप दबंग हो, सरकार विरोधी हो तो आप को “न्यु वर्ल्ड ओर्डर” का शीकार पहले बनना है, उन के डिपोप्युलेशन के एजंडे की तहत । समज लो आप बिमार पडे, अस्पताल गये, डोक्टर आप को देखने से पहले कोंप्युटर देख लेगा । सिस्टम ने आप के लिए डोक्टरों को क्या निर्देश दिये हैं देख लेगा । अगर सिस्टम आप को मारना चाहती हो तो डोक्टर आप को गलत दवा देने के लिए मजबूर होगा । अगर वो ऐसा नही करेगा तो खूद फंस जाएगा ।
इस केप्श्युअल की साईज गेहु के दाने बराबर है । लेकिन नेनो टेक्नोलोजी के कारण इसमें बहुत से डिवाईस लगे हैं । कहा जाता है की इसमें एक नेनो बंब भी लगाया गया है जो इसे शरीरे के अंदर ही तोड देता है, अंदर छूपये साईनाईड को रिलीज कर देता है । जब कोइ पोलिस अधिकारी  कीसी क्रिमिनल को शुट करना चाहता हो तो सिस्टम को अक्सेस कर के करवा सकता है ।
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भारत की जनता सचमुच भेंड जैसा बर्ताव करती है । एक ने बताया हम लोगों ने आधार कार्ड बनवा लिया है आपने नही बनाया ? सब भेडों की तरह दौड पडते हैं । किसी के भी मन में मनमोहन की टोली के बारे में सवाल नही उठता । निलकेणी किस हैसियत से सरकार में निर्णायक भूमिका निभा रहा है ? उस का बोस, नारायण मुर्ति फोर्ड फाउंडेशन की टीम में किस पद पर और क्या कर रहा है ? मनमोहन सबसिडी के खेल खेल कर क्यों गरीब आदमी को भी बेंक खाते खुलवा रहा है ? रिजर्व बेंक क्यों चेक की लेन देन प्रथा बंद कराने की कोशीश में हैं ?
भारत में आज भले कार्ड है केप्शुल नही । प्रमुख काम है डेटा कलेक्शन । एकबार डेटा इकठ्ठा हो जाये तो केप्शुल डालने में देर कितनी ?

Thursday, 21 March 2013

सृष्टि का काल चक्र

सृष्टि का काल चक्र

आधुनिक वैज्ञानिक अब कहते हैं कि हमारी सृष्टि में अनगिनत ग्रह प्रति दिन पैदा हो रहे है और कई ग्रह अपना समय पूरा कर के विलीन हो रहै हैं – लेकिन हिन्दूग्रंथ तो आधुनिक वैज्ञानिकों से हजारों वर्षों पहले से ही कहते आ रहै हैं कि सृष्टि अनादि है – उस का कोई आरम्भ नहीं, सष्टि अनन्त है – उस का कोई अन्त भी नहीं। भारत के अंग्रेजी-प्रेमी शायद आज भी नहीं जानते कि केवल हिन्दू शास्त्रों के समय सम्बन्धी आँकडे ही आधुनिक वैज्ञानिक खगोल शास्त्रियों के आँकडों से मेल खाते हैं।

समय की गणना::
आधुनिक वैज्ञानिक यह भी मानने लगे हैं कि सृष्टि के कालचक्र में ब्रह्मा का (यूनिवर्स) ऐक दिवस और रात्रि, पृथ्वी के एक दिवस और रात्रि के समय से 8.64 कोटि वर्षों बडी होती है। मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में इस धरती के समय का विस्तरित उल्लेख किया गया है। आँख झपकने में जो समय लगता है उसे ऐक निमिष कहा गया है। निमिष के आधार पर समय तालिका इस प्रकार हैः-
• 18 निमिष = ऐक कास्था
• 30 कास्था = 1 कला
• 30 कला = 1 महू्र्त
• 30 महूर्त = अहोरात्र
• 30 अहोरात्र = 1 मास

ऐक अहोरात्र को सूर्य कार्य करने के लिये दिन, तथा विश्राम करने के लिये रात्रि में विभाजित करता है। प्रत्येक मास के दो ‘पक्ष’ होते हैं जिन्हें ‘शुकल-पक्ष’ और ‘कृष्ण-पक्ष’ कहते हैं। पँद्रह दिन के शुकल पक्ष में चाँदनी रातें होती हैं तथा उतनी ही अवधि के कृष्ण पक्ष में अन्धेरी रातें होती हैं। सभी माप दण्डों का सरल आधार ‘30’ की संख्या है। यह समय विभाजन प्रत्यक्ष, वैज्ञानिक, और प्रकृति के अनुकूल है।

दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है जब सभी जीव अपने आप जाग जाते है। नदियों के जल में स्वच्छता और प्रवाह होता है, कमल खिलते है, ताज़ा हवा चल रही होती है तथा प्रकृति सभी को नये, शुद्ध वातावरण का आभास दे देती है। उसी प्रकार जब सूर्यास्त के साथ रात होती है, पशु पक्षी अपने आवास की ओर अपने आप लौट पडते हैं, नदियों का जल धीमी गति से बहने लगता है, फूल मुर्झा जाते है तथा प्रकृति सभी गति विधियां स्थागित करने का संकेत दे देती है। इन प्रत्यक्ष तथ्यों की तुलना में रोमन कैलेण्डर के अनुसार चाहे दिन हो या रात, 12 बजे जब तिथि बदलती है तो प्रकृति में कोई फेर बदल प्रत्यक्ष नहीं होता। सभी कुछ बनावटी और बासी होता है।

पाश्चात्य केलैण्डर::

रोमन कैलेण्डर को जूलियस सीज़र ने रोम विजय के पश्चात ग्रैगेरियन कैलेण्डर के नाम से लागू करवाया था। इस कैलेण्डर का आज भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

वैसे तो ईसाई ऐक ईश्वर को मानने का दावा करते हैं और अधिक देवी देवताओं में विशवास करने के लिये हिन्दूओं का उपहास उडाते हैं। किन्तु उन के पास कोई जवाब नहीं कि उन्हों ने अपने दिनों तथा महीनों को देवी देवताओं के नामों से क्यों जोडा हुआ हैं। उन के सप्ताह में सन गाड का दिन – ‘सन-डे’’ मून गाडेस का दिन – ‘मन-डे’, ट्यूज देवता का दिन – ‘ट्यूजडे’, वुडन देवता का दिन – ‘वेडनेस-डे’, थोर देवता का दिन – ‘थर्स-डे’, फ्रिग्गा गाडेस का दिन – ‘फ्राई-डे’, तथा सैटर्न देवता का दिन – ‘सैटर-डे’ होता है। वास्तव में सप्ताह के दिनों के नाम भी रोमन वासियों नें भारत से ही चुराये हैं क्यों कि हमारे पूर्वजों ने दिनों के नाम सौर मण्डल के ग्रहों पर रखे गये थे जैसे कि रविवार (सूर्य), सोमवार (चन्द्र), मंगलवार (मंगल), बुद्धवार (बुद्ध), बृहस्पतिवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), और शनिवार (शनि)। क्योंकि बडी वस्तु को ‘गुरु’ कहा जाता है और छोटी को ‘लधु ’ – इसलिये बृहस्पतिवार को गुरुवार भी कहा जाता है। हमारे पूर्वजों को आधुनिक वैज्ञानिकों से बहुत पहले ही ज्ञात था कि बृहस्पति सौर मण्डल का सब से बडा ग्रह है।

पोर्तगीज भाषा में कैलैण्डर शब्द को ‘कालन्दर’ बोलते हैं जो संस्कृत के शब्द ‘कालन्तर’ (काल+अन्तर) का अपभृंश है। संस्कृत में कालन्तर उसी श्रेणी का शब्द है जैसे युगान्तर, मनवन्तर, कल्पान्तर आदि हैं। इन मापदण्डों का प्रयोग सौर मण्डल की काल गणना के लिये किया जाता है। रोमन कैलैण्डर के महीने सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर का स्त्रोत्र भी संस्कृत के क्रमशः सप्तमबर (सप्त+अम्बर), अष्टाम्बर, नवम्बर, तथा दशम्बर से है जिनका शब्दिक अर्थ सातवें, आठवें, नवमें और दसवें अम्बर (आसमान) से है।
अंग्रेजों का अपना कोई कैलैण्डर नहीं था और वह जूलियन कैलैण्डर को इस्तेमाल करते थे जिस में या साल ‘मार्च’ के महीने से शुरु होता था। साल में केवल दस महीने ही होते थे। मार्च से गिनें तो सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें महीने ही बनते हैं। जैसे जैसे अंग्रेजों में वैज्ञानिक जागृति आई तो उन्हों ने 1750 में ग्रीगेरियन कैलैण्डर (रोमन कैलैण्डर) को सरकारी कैलैण्डर बनाया और समय गणना को नयी सीख अनुसार पूरा करने के लिये दो महीने ‘जनवरी’ और ‘फरवरी’ भी जोड दिये। परम्परागत जनवरी 31 दिन का था और फरवरी में कभी 28 और कभी 29 दिन होते थे जिस का वैज्ञानिक आधार कुछ नहीं था। पश्चात ब्रिटिश संसद ने अपना वर्ष को मार्च के बदले जनवरी 1772 से प्रारम्भ करना शुरू किया क्यों कि क्रिस्मस के बाद पहला महीना जनवरी आता था।

राशी चक्र की वैज्ञानिक्ता::

पाश्चात्य कैलेण्डर की तुलना में भारत का विक्रमी कैलेण्डर पृथ्वी के सौर मण्डल पर आधारित और वैज्ञानिक है। हमारी पृथ्वी सू्र्य की परिक्रमा लगभग सवा तीन सौ पैंसठ दिन में करती है। ऋगवेद में अनगिनित ताराग्रहों का वर्णन है, जिन को विभाजित कर के पृथ्वी दूारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा के मार्ग का मानचित्र बनाया गया है। मार्ग की पहचान के लिये सितारों के दर्श्नीय फैलाव के अनुरूप, उन के काल्पनिक रेखा चित्र बना कर उन्हें आकृतियों से मिलाया गया है। प्रत्येक विभाग को किसी जन्तु या वस्तु की आकृति के आधार पर ऐक राशि का नाम दिया गया है। राशियों के भारतीय रेखा चित्र आज विश्व भर में ज़ोडियक साईन के नाम से जाने जाते है। केवल ज़ोडियक नामों को ही स्थानीय देशों की भाषा में परिवर्तित किया गया है चित्र भारतीय चित्रों की तरह ही हैं।

360 दिनों को 12 राशियों में बाँट कर वर्ष के अन्दर 30 दिनों के बारह मास बनाये गये हैं। यह वह समय है जब पृथ्वी सूर्य परिक्रमा करते समय एक राशि भाग में लगाती है। दूसरे शब्दों में सूर्य पृथ्वी के उस राशि भाग में रहता है। उसी अवधि को ऐक मास कहा गया है। भारतीय कैलेन्डर के अनुसार स्दैव मास के प्रथम दिन पर ही सूर्य ऐक से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। यह सब कुछ वैज्ञानिक है और प्रत्यक्ष है। बारह राशियों के इसी वैज्ञानिक तथ्य को सूर्य के रथ के पहिये की बारह कडियाँ के रूप में चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया गया है। राशियों की आकृतियों के आधार पर ही नाविक उन्हें ऐक से बारह अम्बरों (आसमान के टुकडों) की भान्ति भी पहचानने लगे थे।

भारतीय खगोल वैज्ञानिकों ने पाश्चात्य वैज्ञानिकों से पूर्व इस तथ्य पर भी विचार किया था कि सूर्य की परिकर्मा में पृथ्वी को सवा 365 दिन लगते हैं। अतः हिन्दू कैलेण्डरों के अन्दर प्रत्येक बारह वर्ष के पश्चात ऐक वर्ष तेरह महीनों का आता है जो दिनों की कमी को पूरा कर देता है। इसी बारह वर्ष की अवधि का सम्बन्ध भारत के कुम्भ आयोजनों से भी है जो हरिदूआर, प्रयाग, काशी तथा नाशिक में हजारों वर्षों से आयोजित किये जा रहै हैं। इस की तुलना में रोमन कौलेण्डर में यह काल लगभग मास के दूसरे या तीसरे सप्ताह में आता है, जो वैज्ञानिक ना हो कर केवल परम्परागत है। रोमन कैलेण्डर के 30 दिनों या 31 दिनों के महीनों तथा फरवरी में 28 या 29 दिनों के होने का कारण वैज्ञानिक नहीं, बल्कि काम चलाऊ है।

अप्राकृतिक रोमन कैलेण्डर हमारे ऊपर उस समय थोपा गया था जब अंग्रेज़ विश्व में अपना उपनेष्वाद फैला रहे थे। ब्रिटेन का अपना कोई कैलेण्डर नहीं था। इसाई देश होने के कारण उन्हों ने रोमन कैलेण्डर को अपना रखा था। ब्रिटेन का समय भारत से लग भग साढे पाँच घन्टे पीछे चलता है। जब भारत में प्रातः साढे पाँच बजे सूर्योदय होता है तो उस समय इंग्लैण्ड में मध्य रात्रि का समय होता है। भारत के ‘प्रत्यक्ष सूर्योदय’ के समय नया दिन आरम्भ करने की प्रथानुसार अंग्रेजों ने अपने देश में मध्य रात्रि के समय नया दिन घोषित कर लिया और उसी प्रथा को अपनी सभी कालोनियों पर थोप दिया। भारत के अतिरिक्त किसी कालोनी का निजि कैलेण्डर नहीं था, अतः किसी देश ने कोई आपत्ति भी नहीं जतायी। ग़ुलाम की भान्ति उन्हों ने अंग्रेजी मालिक का हुक्म स्वीकार कर लिया। किन्तु भारत में स्थानीय पाँचांग चलता रहा है जिस की अनदेखी भारत के सरकारी तन्त्र ने धर्म निर्पेक्षता की आड में करी है।

युग-काल का विधान::

हमारे पूर्वजों ने केवल पृथ्वी की समय गणना का विधान ही नहीं बनाया था, बल्कि उन्हों ने सृष्टि की युग गणना का विधान भी बनाया था जिस के आँकडों को आज विज्ञान भी स्वीकारनें पर मजबूर हो रहा है।
भारतीय गणना के अनुसार चार युगों का ऐक चतुर्युग होता है। यह वह समय है जो ‘हमारा सूर्यमण्डल’ अपने से बडे महासूर्य मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। यह गणना मन-घडन्त नहीं अपितु ऋगवेद के 10800 पद्धो तथा 432000 स्वरों में दी गयी है।

सतयुग, त्रेता, दूापर, और कलियुग चार युग माने जाते हैं। चार युगों से ऐक चतुर्युग बनता है। चतुर्युग के अन्दर युगों के अर्न्तकाल का अनुपात 4:3:2:1 होता है। अतः प्रत्येक युग की अवधि इस प्रकार हैः-
• सतयुग – 17 लाख 28 हज़ार वर्ष
• त्रेता युग – 12 लाख 96 हज़ार वर्ष
• दूापर युग – 8 लाख 64 हज़ार वर्ष
• कलियुग – 4 लाख 32 हज़ार वर्ष (कुल जोड – 432000 वर्ष)

71 चतुर्युगों से ऐक मनवन्तर बनता है (30 करोड 67 लाख 20 हज़ार वर्ष) यह वह समय है जो महासूर्य मण्डल अपने से भी अधिक विस्तरित सौर मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। इस से आगे भी बडे सूर्य मण्डल हैं जिन की परिकर्मा हो रही है तथा वह अनगिनित हैं।

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन ::

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन का चक्र निरन्तर निर्विघ्न चलता रहता है। सर्जन 4.32 करोड वर्ष (ऐक चतुर्युग) तक चलता है जिस के पश्चात उतने ही वर्ष विसर्जन होता है। सृष्टि-कल्प वह समय है जब ब्रह्मा सृष्ठि की रचना करते हैं । इसी के बराबर समय का प्रलय-कल्प भी होता है। प्रलय-कल्प में सृष्ठि का विसर्जन होता है । सृष्ठि और प्रलय ऐक दूसरे के पीछे चक्र की तरह चलते रहते हैं जैसे हमारे दिनों के पीछे रातें आती है। सर्जन-विसर्जन के समय का जोड 8.64 करोड वर्ष होता है जिसे ब्रह्मा का ऐक दिवस (अहरोत्रा) माना गया है। ऐसे 360 अहरोत्रों से ब्रह्मा का ऐक वर्ष बनता है जो हमारे 3110.4 केटि वर्षों के बराबर है।

हिन्दू शास्त्रों ने ऐक कल्प को 14 मनुवन्तरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मनुवन्तर में 30844800 वर्ष होते हैं अथवा 308.448 लाख वर्ष होते हैं।
हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि की रचना श्वेतावराह कल्प में 1.972 करोड वर्ष पूर्व हुई थी। उस के पश्चात छः मनुवन्तर बीत चुके हैं और सातवाँ वैभास्वत मनुवन्तर अभी चल रहा है। पिछले मनुवन्तर जो बीत चुके हैं उन के नाम स्वयंभर, स्वारोचिश, ओत्तमी, तमस, रविवत तथा चक्षाक्ष थे।
सातवें मनुवन्तर के 28 चतुर्युग भी बीत चुके हैं और हम 29वें चतुर्युग के कलियुग में इस समय (2012 ईसवी) जी रहे हैं । वर्तमान कलियुग के भी 5004 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं

भागवत पुराण के अनुसार भक्त ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद स्वयंभर मनु के युग में हुये थे जो आज (2012 ईसवी) से 1.99 करोड वर्ष पूर्व है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इन गणाओं की अनदेखी करते रहे लेकिन जब अमेरिकन शोधकर्ता माईकल ए क्रामो ने कहा कि मानव आज से 2 करोड वर्ष पूर्व धरती पर आये तो भागवत पूराण के कथन की पुष्टि हो गयी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह काल गणना खगौलिक है। इस गणना के अनुसार आज की मानवी घटनाओं को जोडना उचित नहीं होगा। जैसे हाथी तोलने वाले माप दण्डों से स्वर्ण को नहीं तोला जाता उसी प्रकार किसी व्यक्ति की आयु का आंकलन ‘लाईट-यीर्स’ या ‘नैनो-सैकिण्डस ’ में नहीं किया जाता।

भारतीय कैलैण्डर की उपेक्षा ::

अंग्रेज़ी पद्धति अनुसार प्रशिक्षित भारतीय युवा अपने गौरवशाली पूर्वजों की उपलब्धियों को भूल कर अपने आप में ही गर्वित रहते हैं। जो कुछ अंग्रेज़ थूकते रहै मैकाले प्रशिक्षित भारतीय उसे खुशी से चाटते रहै हैं। आज से केवल पचास वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज घटनाओं को भारत के देसी महीनों के माध्यम से याद रखते थे किन्तु वह प्रथा अब लुप्त होती जा रही है। भारत के अंगेजी प्रशक्षित आधुनिक युवा देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते। कदाचित वह समझते हैं कि भारत का अपना कोई कैलेण्डर ही नहीं था और रोमन कैलेण्डर के बिना हम प्रगति ही नहीं कर सकते। अपनी मनोविकृति के कारण हम आदि हो चुके हैं कि सत्य वही होता है जिसे पाश्चात्य वैज्ञानिक माने। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक ऐक स्वर में बोल रहे थे कि चन्द्रमां पर जल नहीं है। परन्तु जब भारत के चन्द्रयान ने चाँद की धरती पर जल के प्रमाण दिये तो अमेरिकी नासा ने भी पुनः खोज कर के भारत के कथन की पुष्टि कर दी।

अंतरीक्ष की भारतीय समय सारणी को भी आज के विज्ञान के माध्यम से परखा जा सकता है। यदि यह काम विदेशी ना करें तो भारत के वैज्ञानिकों को स्वयं करना चाहिये। हमारी उपलब्धियों को स्वीकृति ना देना पाश्चात्य देशों के स्वार्थ हित में है क्यों कि उन्हों ने भारत की उपलब्धियों को हडप कर अपना बनाया हुआ है। लेकिन हम किस कारण अपने पूर्वजों की धरोहर उन्हें हथियाने दें ? हम अपनी उपलब्दधियों की प्रमाणिक्ता पाने के लिये पाश्चात्य देशों के आगे हाथ क्यों फैलाते रहते हैं ?
(चाँद शर्मा)

scam

Named scandals in India
ScandalYear reportedScopeLocationKey playersSummary
2012 Indian coal mining controversy2012INR1,855,913.4 million (US$34 billion)nationComptroller and Auditor General of India, the coal ministry, many electricity boards and private companiescoal blocks allotted, not auctioned, leading to estimated losses as per the Comptroller and Auditor General of India[1][2][3]
Karnataka Wakf Board Land Scam2012INR2,000 billion (US$37 billion)Karnataka[4][5]
Uttar Pradesh NRHM scam2012INR100 billion (US$1.8 billion)Uttar PradeshMayawati[6][7][8][9][10]
2G spectrum scam2010INR1,760 billion (US$32 billion)nationalNira Radia, A. Raja, M. K. Kanimozhi, many telecommunications companiescommunication bandwidth auctioned for lower than market value[11][12]
Uttar Pradesh food grain scam2003INR350 billion (US$6.4 billion)Uttar PradeshKapil Sibal, Mulayam Singh Yadav, MayawatiFood which the government purchased to give to the poor was instead sold on the open market[13][14][15][16]

[edit]2012

[edit]2011

[edit]2010

[edit]2000s

[edit]2009

[edit]2008

[edit]2006

[edit]2005

  • Taj Co-operative Group Housing Scheme scam – INR40 billion (US$730 million)[221][222]
  • IPO scam[223][224]
  • Bihar flood relief scam – INR170 million (US$3.1 million)[225]

[edit]2004

[edit]2003

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[edit]2001

[edit]2000

[edit]1990s

[edit]1997

[edit]1996

[edit]1995

  • Meghalya forest scam – INR3 billion (US$55 million)[211]
  • Preferential allotment scam – INR50 billion (US$920 million)[36]
  • Yugoslav Dinar Scam – INR4 billion (US$73 million)[36]

[edit]1994

[edit]1992

[edit]1990

[edit]1980s

[edit]1989

[edit]1981

[edit]1970s

[edit]1976

  • Kuo oil scandal – INR22 million (US$400,000)[40]

[edit]1974

[edit]1960s

[edit]1965

  • Kaling tubes scandal[40]

[edit]1964

[edit]1960

  • Teja loan scandal – INR220 million (US$4.0 million)[233]

[edit]1950s

[edit]1956

  • BHU funds misappropriation – INR5 million (US$92,000)[233]

[edit]1951

[edit]1948s

Jeep Purchase (1948)[244]

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